भगवान श्री कृष्ण के प्राकट्य, अन्तर्धान एवं उनकी लीलाओं को समझना।

अन्तर्धान
वेदास!
20 Oct 2019

सारांश: जल्दी ही हम भगवान श्री कृष्ण के प्राकट्य दिवस को मनाएंगे। हमारा ध्यान भगवान कृष्ण और विशेष रूप से उनके प्राकट्य के पारलौकिक प्रकृति की ओर आकर्षित होगा। उनके अन्तर्धान होने की दिव्य प्रकृति उनके प्राकट्य की लीला पर बहुत प्रकाश डालता है और यही इस सप्ताह के पठन का विषय है। भगवान की लीलाओं की 'लीला' प्रकृति को स्पष्ट करने में जीव गोस्वामी और विश्वनाथ चक्रबर्ती ठाकुर की टिप्पणियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। कृपया उनकी टिप्पणी को बहुत ध्यान से पढ़ें। जब हम उद्धव द्वारा यह सुनते हैं कि एक श्रद्धावान एवं समर्पित भक्त दृढ़ मन को प्राप्त करता है तब यह संदेश हमारे हृदय को शक्ति प्रदान करता है। निश्चित रूप से कभी भी भ्रमित नहीं होने की स्थिति प्राप्त करने के लिए देहात्म बुद्धि से परे आत्मतत्व का एवं भगवान श्री कृष्ण की दिव्यता का ज्ञान होना आवश्यक है। तब भगवान श्री कृष्ण एवं उनके प्रिय प्रतिनिधियों के प्रति पूर्ण समर्पण से व्यक्ति भ्रम की स्थिति से परे पहुँच जाता है। 
तपस्याओं से प्राप्त होने वाली शुद्धि स्वयं को कृष्ण के प्रत्यक्ष दर्शन के योग्य बनाने के लिए आवश्यक है।

प्रश्न:
१) व्याख्या करिये कि कैसे श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर द्वारा वर्णित कथा भगवान श्री कृष्ण के अंतर्धान की लीला से संबंधित है। (नीचे दिए गए तात्पर्य को देखें)

२) वह तीन मुख्य कारण बताइए जिसकी वजह से ज्यादातर लोग भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं को नहीं समझ पाते हैं।

पढ़ने के लिए पठन सामग्री:
अ) श्रीमद्भागवत ३.२.१०
ब) श्रीमद्भागवत ३.२.११
स) श्रीमद्भागवत ११.३१.११
द) श्रीमद्भागवत ११.३१.१२-१३ (तात्पर्य हटा दिए गए हैं)

अ) श्रीमद्भागवत ३.२.१० 
अनुवाद: भगवान् की माया द्वारा मोहित व्यक्तियों के वचन किसी भी स्थिति में उन लोगों की बुद्धि को विचलित नहीं कर सकते जो पूर्णतया शरणागत हैं । 
तात्पर्य: वेदों के समस्त प्रमाणों के अनुसार श्रीकृष्ण ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। सभी आचार्यों ने, यहाँ तक कि श्रीपाद शंकराचार्य ने उन्हें भगवान् स्वीकार किया है, किन्तु जब कृष्ण इस संसार में विद्यमान थे तो विभिन्न श्रेणी के व्यक्तियों ने भिन्न - भिन्न प्रकार से उन्हें स्वीकार किया। अतएव भगवान् विषयक उनके अनुमान भी भिन्न - भिन्न थे।सामान्यतया जिन लोगों को शास्त्रों में विश्वास था उन्होंने भगवान् को यथारूप में स्वीकार किया और इस जगत से भगवान् के अन्तर्धान होने पर सारे लोग उनके विकट विछोह में डूब गये। प्रथम स्कन्ध में हम अर्जुन तथा युधिष्ठिर के शोक की विवेचना कर चुके हैं, जिनके लिए कृष्ण का अन्तर्धान होना उनके जीवन के अन्त तक अतीव असह्य बना रहा।यादवगण भगवान् से आंशिक रूप में अवगत थे। वे भी महिमावान हैं, क्योंकि उन्हें अपने परिवार के प्रमुख के रूप में भगवान् की संगति करने का अवसर मिला था और उन लोगों ने भगवान् की अन्तरंग सेवा भी की थी। यादवगण तथा भगवान् के अन्य भक्त उन लोगों से भिन्न हैं, जिन्होंने गलत आकलन द्वारा उन्हें सामान्य व्यक्ति मान लिया था। ऐसे लोग निश्चित रूप से माया द्वारा भ्रमित होते हैं। वे नारकीय होते हैं और भगवान् से ईर्ष्या करते हैं। उन पर माया अत्यन्त बलपूर्वक कार्य करती है, क्योंकि ऐसे लोग उच्च संसारी शिक्षा के बावजूद श्रद्धाविहीन होते हैं तथा नास्तिकता की मानसिकता से संदूषित होते हैं। वे लोग यह स्थापित करने के लिए सदैव उत्सुक रहते हैं कि कृष्ण सामान्य पुरुष थे, जो पृथ्वी के आसुरी राजाओं अर्थात्, धृतराष्ट्र के पुत्रों तथा जरासन्ध को मारने का षड्यंत्र करने के पापों के फलस्वरूप एक शिकारी द्वारा मार डाले गये। वे भगवद्गीता के इन कथनों में कोई विश्वास नहीं रखते कि भगवान् कर्मफलों से अप्रभावित रहते हैं - न मां कर्माणि लिम्पन्ति। नास्तिकतावादी दृष्टिकोण के अनुसार भगवान् कृष्ण का सारा परिवार यदुवंश, कृष्ण द्वारा धृतराष्ट्र के पुत्रों का वध करने आदि के फलस्वरूप किये गये पापों के कारण ब्राह्मणों से शापित होने से विनष्ट हो गया। ये लांछन भगवद्भक्तों के हृदय को स्पर्श नहीं करते, क्योंकि वे वास्तविकता जानते रहते हैं। भगवान् के सम्बन्ध में उनकी बुद्धि कभी विचलित नहीं होती। किन्तु जो लोग असुरों के कथनों से विचलित हो उठते हैं उनकी भी भर्त्सना की जाती है। इस श्लोक में उद्धव यही कहना चाहते हैं।

ब) श्रीमद्भागवत ३.२.११ 
अनुवाद: भगवान् श्रीकृष्ण, जिन्होंने पृथ्वी पर सबों की दृष्टि के समक्ष अपना नित्य स्वरूप प्रकट किया था, अपने स्वरूप को उन लोगों की दृष्टि से हटाकर अन्तर्धान हो गये जो वांछित तपस्या न कर सकने के कारण उन्हें यथार्थ रूप में देख पाने में असमर्थ थे। 
तात्पर्य: इस श्लोक में अवितृप्त - दृशाम् शब्द अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। भौतिक जगत में बद्धात्माएँ विविध प्रकार से अपनी इन्द्रियों को तुष्ट करने में लगी हुई हैं, किन्तु वे वैसा करने में असफल रही हैं, क्योंकि ऐसे प्रयासों से तुष्ट हो पाना असम्भव है। स्थल पर मछली का दृष्टान्त अत्यन्त उपयुक्त है । यदि कोई गछली को पानी से बाहर निकाल कर स्थल पर रख देता है, तो वह सुखी नहीं रह पाती चाहे उसे कितना ही आनन्द क्यों न प्रदान किया जाय। आत्मा परम पुरुष भगवान् के ही सानिध्य में सुखी रह सकता है, अन्यत्र नहीं। भगवान् को असीम अहेतुकी कृपा से उनके पास आध्यात्मिक जगत में ब्रह्मज्योति मण्डल में असंख्य वैकुण्ठलौक और उस दिव्य जगत में जीवों के असीम आनन्द के लिए अनन्त व्यवस्था है। भगवान् स्वयं अपनी उन दिव्य लीलाओं को प्रदर्शित करने के लिए आते हैं, जो विशेष रूप से वृन्दावन, मथुरा तथा द्वारका में सम्पन्न की जाती हैं। वे बद्धात्माओं को शाश्वत लोक भगवद्धाम के लिए आकृष्ट करने हेतु प्रकट होते हैं। किन्तु पर्याप्त पुण्य के अभाव में दर्शकगण भगवान् की ऐसी लीलाओं के प्रति आकृष्ट नहीं होते। भगवद्गीता में कहा गया है कि जिन्होंने पापमार्ग को पूरी तरह लाँध लिया है, वे ही भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में अपने को लगा सकते हैं। सम्पूर्ण वैदिक कर्मकाण्ड का उद्देश्य प्रत्येक बद्धात्मा को पुण्य मार्ग पर लगाना है। समस्त वर्गों के लिए नियत नियमों का कड़ाई से पालन करने पर मनुष्य सत्य, मनोनिग्रह, इन्द्रियनिग्रह, धैर्य इत्यादि गुणों को प्राप्त कर सकता है और भगवान् की शुद्ध भक्ति करने के पद तक उठ सकता है। ऐसी दिव्य दृष्टि से ही मनुष्य की भौतिक लालसएँ पूर्णतया तुष्ट हो सकती हैं। जब भगवान् विद्यमान थे तो जो लोग उन्हें असली रूप में देखने को अपनी भौतिक लालसा पूरी कर सके वे उन के साथ भगवद्धाम वापस जा सके। किन्तु जो लोग भगवान् को यथारूप में नहीं देख पाये वे भौतिक लालसाओं से बद्ध रहे और भगवद्धाम वापस नहीं जा सके । जब भगवान् सबों की दृष्टि से परे चले गये तो उन्होंने अपने आदि नित्य रूप में ऐसा किया जैसाकि इस श्लोक में कहा गया है। उन्होंने सशरीर प्रयाण किया। उन्होंने अपना शरीर छोड़ा नहीं जैसाकि बद्धात्माएँ सामान्य रूप से गलती से समझती हैं। यह कथन उन श्रद्धाविहीन अभक्तों के इस मिथ्या प्रचार को झुठला देता है कि भगवान् सामान्य बद्धात्मा की तरह दिवगंत हुए। भगवान् इस जगत से अविश्वासी असुरों का अनुचित भार हटाने के लिए प्रकट हए थे और ऐसा करने के बाद संसार की दृष्टि से ओझल हो गये।

स) श्रीमद्भागवत ११.३१.११ 
अनुवाद: हे राजा, तुम जान लो कि भगवान् का प्राकट्य तथा उनका अन्तर्धान होना, जो देहधारी बद्धजीवों के ही सदृश होते हैं, वास्तव में उनकी मायाशक्ति द्वारा अभिनीत खेल है जैसा कि कोई अभिनेता करता है। वे इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि करके उसमें प्रवेश करते हैं, कुछ काल तक उसके भीतर खिलवाड़ करते हैं और अन्त में समेट लेते हैं। तब भगवान् विराट जगत के सारे कार्यों को बन्द करके, अपनी दिव्य महिमा में स्थित रहते जाते हैं। 
तात्पर्य: श्रील जीव गोस्वामी के अनुसार यदुवंश के सदस्यों में हुई तथाकथित लड़ाई भगवान् की लीला शक्ति का प्रदर्शन थी क्योंकि कृष्ण के निजी संगी कभी भी बद्धजीवों की तरह सामान्य जन्म तथा मृत्यु के चक्कर में नहीं पड़ते। ऐसा होने से, स्वयं भगवान् जन्म मृत्यु से परे हैं जैसाकि इस श्लोक में स्पष्ट कहा गया है। यहाँ पर नटस्य शब्द महत्त्वपूर्ण है । श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर किसी जादूगर को निम्नलिखित कहानी बतलाते हैं, जो मरने की कलाबाजी दिखलाता है। एक जादूगर किसी राजा के द्वारा रखाये गये बहुमूल्य वस्त्रों, रत्नों, सिक्कों इत्यादि के ढेर के पास राजा के सामने जाता है। रत्नजटित हार अपने हाथ में लेते हुए जदूगर राजा से कहता है, “अब में इस हार को ले रहा हूँ और अब आप इसे नहीं ले सकते" और वह उस हार को गायब कर देता है। "अब मैं यह सोने का सिक्का उठा रहा हूँ : आप इसे नहीं ले सकते "यह कह कर वह सोने के सिक्के को गायब कर देता है। इसी तरह राजा को चेतावनी देते हुए वह राजा के सात हजार घोड़ों को गायब कर देता है। इसके बाद वह जादूगर ऐसा मोहजाल फैलाता है कि राजा के लड़के, नाती - पोते, भाई तथा अन्य परिवार वाले एक - दूसरे पर हमला करते हैं और इस उग्र लड़ाई में प्रायः सभी मृत हो जाते हैं। राजा उस जादूगर को बोलते देखता है और उस विशाल सभाभवन में बैठे वह अपने सामने इन घटनाओं को घटित होते देखता है। "तत्पश्चात् वह जादूगर कहता है: हे राजन् ! मैं अब ज्यादा जीवित नहीं रहना चाहता। जिस तरह मैंने जादू सीखा है, उसी तरह अपने गुरु के चरणकमलों की कृपा से मैंने योग का ध्यान भी सीखा है। मनुष्य को किसी तीर्थस्थान में ध्यान करते हुए अपना शरीर छोड़ देना चाहिए और कि आपने तमाम पुण्यकर्म किये हैं, इसलिए आप स्वयं तीर्थस्थान हैं। इसलिए अब मैं अपना शरीर छोड़ दूंगा।"
"इस तरह कह कर, वह जादूगर उचित योग - आसन में बैठ जाता है और अपने को प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि में स्थिर करके मौन हो जाता है। एक क्षण बाद उसकी समाधि से उत्पन्न अग्नि उसके शरीर से निकल कर जलती है और उसे भस्म कर देती है। तब उसकी सारी पलियाँ, शोकाकुल होकर अग्नि में प्रवेश करती हैं " “तीन या चार दिन बाद, अपने प्रान्त में लौट जाने के बाद, वह जाद्गर अपनी एक पुत्री को राजा के पास भेजता है। पुत्री ने उससे कहा, "हे राजा ! मैं अभी अभी आपके महल में अपने साथ बिना किसी के देखें, आपके स्वस्थ पुत्रों, पौत्रों, भाइयों इत्यादि को लेकर आई हूँ। साथ में आपके द्वारा प्रदत्त सभी रल तथा अन्य वस्तुएँ भी लाई हूँ। इसलिए आप मुझे इस जादूगरी के लिए जो आपके समक्ष प्रदर्शित किया गया है, समुचित पुरस्कार दें। "इस तरह सामान्य जादू भी जन्म मृत्यु की नकल कर सकता है। 
इसलिए यह समझना कठिन नहीं है कि भगवान्, प्रकृति के नियमों से परे होते हुए भी, अपनी मायाशक्ति प्रदर्शित करते हैं जिससे मूर्ख लोग यह सोचें कि भगवान् ने अपना शरीर एक सामान्य व्यक्ति की तरह त्यागा है। वस्तुतः भगवान् कृष्ण अपने नित्य शरीर में ही अपने धाम लौट गये जिसकी पुष्टि समूचे वैदिक वाङ्मय में हुई है।

द) श्रीमद्भागवत ११.३१.१२-१३: 
अनुवाद: भगवान् कृष्ण अपने गुरु-पुत्र को सशरीर यमराज के लोक से वापस ले आये और जब तुम अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र द्वारा जला दिये गये थे, तो उन्होंने परम रक्षक के रूप में तुम्हें भी बचाया। उन्होंने मृत्यु के दूतों को भी मृत्यु देने वाले शिवजी को युद्ध में परास्त किया और जरा शिकारी को उसके मानव शरीर में वैकुण्ठ भेज दिया। क्या कभी ऐसा पुरुष अपनी रक्षा करने में असमर्थ हो सकता है? असीम शक्तियों के स्वामी भगवान् कृष्ण असंख्य जीवों की उत्पत्ति, पालन तथा संहार के एकमात्र कारण होते हुए भी, इस जगत में अपने शरीर को अब और अधिक नहीं रखना चाहते थे। इस तरह उन्होंने आत्मस्थ लोगों को गन्तव्य दिखलाया और यह प्रदर्शित किया कि इस मर्त्य जगत का कोई अपना मूल्य नहीं है।

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