धर्म का विश्लेशण आत्मा के स्तर पर।

vedashindi
Pankaj !
19 Jan 2019

आज किसी ने धर्म की बात की और कहा कि सबसे बड़ा धर्म किसी की आत्मा को तनिक भी कष्ट न देना। आइये इसे समझते हैं। 

धर्म की परिभाषा:
धर्म की यह परिभाषा हम सभी के समझ से बाहर है। आइए हम धर्म की परिभाषा को समझते हैं। धर्म की पढ़ाई के लिए हम लोग किसी विद्यालय में नहीं गए तथा किसी गुरु के मार्ग निर्देशन में भी नहीं पढ़े इसलिए हमें धर्म का मतलब नहीं पता है। हमारे धर्म ग्रंथों में कहा गया है कि "धर्मम् तु साक्षात भगवत् प्रणीतम" इसका अर्थ है कि जो कुछ भी भगवान के मुख से निकला वही धर्म है।  हम लोग विद्यालय में पढ़े थे की चीनी का धर्म मिठास है। इसी तरह यदि हम धर्म ग्रंथों को पढ़ें तो हमें पता चलता है कि हम यह शरीर नहीं हैं बल्कि हम इस शरीर में रहने वाली आत्मा हैं। हमारे देश के बड़े-बड़े आध्यात्मिक शिक्षाविद तथा महात्मा लोग इस बात को अपने जीवन में उतारते हैं की मनुष्य केवल शरीर ही नहीं है बल्कि असली जीव तो प्रत्येक प्राणियों के हृदय में रहने वाली आत्मा है। इस बात को हमारे परम पिता भगवान श्री कृष्ण जी श्री मद्गवद्गगीता जी के द्वितीय अध्याय में अर्जुन को प्राणियों के हृदय में रहने वाली आत्मा के सारे गुणधर्म बताते हैं। धर्म की परिभाषा समझने से पहले हमें यह समझना अनिवार्य है कि हम वास्तव में इस शरीर के हृदय में रहने वाली आत्मा हैं। अब आइए आत्मा की चर्चा करते हैं। श्रीमद् भगवद्गीता जी के 15 में अध्याय के 7वेंं श्लोक में हमारे परम पिता भगवान श्री कृष्ण जी कहते हैं कि इस संसार के सारे जीव हमारे अंंश हैं यानी कि इस संसार के सारे जीव भगवान कृष्ण जी के अंश हैं. अब हमें यह समझना आसान हो जाएगा कि हमारा धर्म क्या है. हमारे धर्म शास्त्रों में बताया गया है कि हमारे दो तरह के धर्म हैं १. अवर धर्म और २. परमो धर्म ।

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अवर धर्म का अर्थ है निचले स्तर का धर्म=हमारे शरीर तथा शरीर के सम्बन्धियों से जुड़ा हुआ धर्म- जैसे कि हमारे हाथ का धर्म है भोजन को उठाकर मुंह में डालना जिससे कि वह भोजन हमारे पेट में पहुंच जाए। इसका निष्कर्ष यह निकलता है कि जो हमारे शरीर का भाग है हाथ उसका काम है हमारे शरीर की सेवा करना। यह धर्म जोकि रोटी कपड़ा और मकान से संबंधित है इस धर्म का पालन प्राय इस दुनिया के सभी लोग कर रहे हैं।

दूसरा धर्म जिसे परो धर्म कहा जाता है  इसे श्रेष्ठ धर्म कहते हैं क्योंकि यह आत्मा से संबंधित है। आत्मा ही इस शरीर के जीवित रहने का आधार है। हमारी आत्मा भगवान श्री कृष्ण का अंश हैं अतः हमारा  श्रेष्ठ धर्म भगवान श्री कृष्ण जी की सेवा करना है। जीवेर स्वरूप होय कृश्नेर नित्य दास अर्थात जीव शाश्वत रूप से भगवान के दास है। दास का काम स्वामी की सेवा करना है। जीव के अंदर से ये सेवाभाव किसी भी परिस्थिति में निकाला नहीं जा सकता इसीलिए इसे ही सनातन धर्म कहते है। और ये कैसे सनातन हुआ? भगवान सनातन है और जीव उनका अंश है। इसका मतलब ये हुआ की जब से भगवान है तब से जीव भी है इसीलिए जीव भी सनातन है। दूसरे शब्दों में भगवान और जीव हमेशा ही है  तो जीव के सेवा करने का कोई आदि और अंत नहीं है इसीलिए ये सनातन धर्म है। हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, यहूदी और पारसी ये सब एक विश्वास है जो की बदल सकता है हिंदू मुस्लिम या मुस्लिम हिंदू हो सकता है लेकिन जो सनातन धर्म है वो नहीं बदल सकता जैसे की नमक का धर्म नमकीन है ये नमकीन स्वभाव नमक से निकाला नहीं जा सकता है। उसी प्रकार से जीव के अंदर से सेवा भाव नहीं निकाला जा सकता है। सच्चाई ये है हम सब किसी ना किसी रूप में कहीं ना कहीं किसी ना किसी की सेवा कर ही रहे हैं क्यूँकि जीव का स्वाभाविक रूप ही सेवा करना है। संसार में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जोकि सेवा ना कर रहा हो किंतु हमें भगवान की सेवा करनी है यही सनातन धर्म है। श्रील प्रभुपाद जी कहते हैं की अगर हम भगवान की सेवा नहीं कर रहे है तो हम कुत्ते की सेवा में लगे है।

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भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद् भगवद्गगीता जी में आत्मा के जो लक्षण बताए हैं वह सारे हमारी कसौटी पर खरे उतरते हैं जैसे कि हमारे परम पिता भगवान श्री कृष्ण जी श्रीमद्भगवद्गीता जी के दूसरे अध्याय के २०वें श्लोक में कहते हैं कि: 

न जायते म्रियते वा कदाचि-
न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ २.२० ॥
अर्थ: आत्मा के लिए किसी भी काल में ना तो जन्म है ना मृत्यु वह ना तो कभी जन्मा है ना कभी जन्म लेता है और ना जन्म लेगा। वह अजन्मा नित्य शाश्वत तथा पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर वह मारा नहीं जाता। 

इसका प्रमाण यह है कि इस संसार में कोई भी व्यक्ति मरना नहीं चाहता क्योंकि जो हमारी आत्मा है हम वास्तव में वही हैं जिसका न जन्म होता है न मृत्यु होती है यह आत्मा सनातन है.  

अब हम यह आसानी से समझ सकते हैं कि हमें किसी भी आत्मा को दुख नहीं देना है क्योंकि सभी जीव हमारे परम पिता भगवान श्री कृष्ण की संतान हैं, अर्थात हमारे भाई हैं। हम सांसारिक स्तर पर भी यह समझ सकते हैं कि एक परिवारव में हमारा यह धर्म होता है कि हम अपने भाइयों को कष्ट ना दें।

सारे वेदों का और वर्णाश्रम धर्म व्यवस्था का उद्देश् भी यही है कि हमारे अंदर सुषुप्त अर्थात सोयी हुई भगवद् प्रेम को विकसित करना है यानि कि भगवद्-सेवा को जगाना है।

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आप सभी लोगों से हमारा नम्र निवेदन है कि इसे जरूर पढ़ें और अपने आसपास के लोगों को भी बताएं तथा अधिक से अधिक  साझा (शेयर) करें। अगर किसी को कोई भी प्रश्न हो तो जरूर लिखें उसका निवारण किया जाएगा धन्यवाद। 

सदा ही भगवान के नाम का जप करिए और ख़ुश रहिए। “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।। “परम विजयते श्रीकृष्ण संकीर्तनम” इस कलियुग में यह संकिर्तन आंदोलन (कृष्ण के पवित्र नाम का सामुहिक जप) मानवता के लिए प्रमुख वरदान है।🙏

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