दूसरों में कमियाँ ढूँढने की प्रवृत्ति से छुटकारा पाना

doosron main kamiyan dhoondne ki pravarti se chutkara pana
वेदास!
6 Sep 2019

दूसरों में कमियाँ ढूँढने की प्रवृत्ति (किसी ओर प्रवृत्त होने की क्रिया या भाव) से छुटकारा पाने पर:

प्रश्न: मेरे अन्दर "प्राकृतिक" रूप से बहुत ही आलोचनात्मक प्रवृत्ति है और इसलिए लोगों में गलतियोंकमियों को पाते हैं। अधिकांशत:, मानसिक स्तर पर मैं लोगों के साथ गलती खोजता हूँ और जरूरी नहीं कि इसे व्यक्त करें। यह आदत भक्तों तक भी फैली है। मुझे महसूस होता है और जानता हूँ कि ऐसा नहीं करना है। लेकिन, जैसा कि मैंने कहा, यह एक आदत बन गया है और मुझे लग रहा यह त्यागना मुश्किल है। इस पूरी प्रक्रिया में, मैं जानता हूँ कि मैं ग़लत हूँ और इसलिए मैं मेरे व्यवहार के लिए हमेशा परेशान रहता हुँ (लेकिन ऐसा एक पलटी हुयी कार्रवाई के रूप में होता है और मैं मेरे मन को नियंत्रण करने में सक्षम नहीं हुँ)। कृपया मुझे सलाह दें कि इस आदत के लिए मुझे क्या करना चाहिए और इसे कैसे बंद करना चाहिए! मुझे लगता है यह मेरी भक्ति में बाधा है और मुझसे गुरु और कृष्ण भी प्रसन्न नहीं होंगे।

रोमपाद स्वामी महाराज द्वारा उत्तर: दूसरों में दोष-ढूँढने वाली प्रवृत्ति पर काबू पाने के लिए एक बहुत ही सरल और पक्का सलाह बतायी गयी है: जान-बूझकर विपरीत आदत डालें! दूसरों में अच्छे गुणों को खोजकर निकाले और दिल से सराहना करे, विशेष रूप से इस संबंध में कि कैसे ये गुण जो उनको उपहार के रूप में मिला है कैसे गुरु और कृष्ण की सेवा में इस्तेमाल किया जा रहा है।

भक्तों के अच्छे गुणों को स्वीकारना और उनकी प्रशंसा करना आप अच्छे से जानबूझकर और सचेत होकर नियमित अभ्यास के रूप में प्रयास शुरू कर सकते हैं, और इस तरह जब भी मौक़ा मिले तो आप इसे मौखिक रूप से व्यक्त करें और प्रशंसा करें। और भी बेहतर अवसर हैं भक्तों की विनम्र भाव से हार्दिक सेवा करे और सेवा करते हुए उनके विशिष्ट गुणों को जो आप उनमें देखते हैं उसका ध्यान करें और सराहना करें - इस तरह से वैष्णव की सेवा से हृदय कोमल होता हैं और सभी प्रकार के आलोचनात्मक मानसिकता से शुद्ध हो जाते हैं। आप यह भी कर सकते हैं खुद को उन लोगो के संग में लगाइए जो लोग इस तरह के गुण रखते हैं और जो दूसरों के गुणों की सराहना करते हैं तथा उनके साथ में रहकर सेवा कीजिए।

जैसे-जैसे आप दूसरों की सराहना करते हैं, मनमाने ढंग से उनके कुछ स्वतंत्र गुणों की प्रशंसा करने के बजाए यह समझना बहुत फायदेमंद होगा कि किस तरह से कृष्ण की अवरोही कृपा इन भक्तों के जीवन में बह रही है और किस तरह उनके जीवन को बदल रही है, और वे अपनी क्षमता के अनुसार ईमानदारी से कैसे कृष्ण और उनके भक्तों का आश्रय लेंने का प्रयास कर रहे हैं। इस एक अच्छे गुण "कृष्ण एक-शरण" के द्वारा - समय के अनुसार एक भक्त में सभी वांछनीय गुण विकसित होते हैं, जबकि यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि एक गैर भक्त के पास कोई अच्छा गुण होता नहीं है, क्योंकि वह मानसिक विमान पर होता है।(भगवद गीता १.२८ तात्पर्य)

आखिरकार, हम न तो तथाकथित बुरे गुणों की आलोचना करने में और न ही संसारी अच्छे गुणों की प्रशंसा में रुचि रखते हैं। कृष्ण अपने वफादार भक्तों को दिव्य गुणों से सजाते हैं और उनके भक्तों की सराहना करके वास्तव में हम कृष्ण के प्राकट्य दया की प्रशंसा कर रहे हैं। आप पाएंगे कि भले ही भक्तों में कुछ तथ्यात्मक रूप से मामूली विसंगतियां हो सकती हैं, कृष्ण के साथ उनके संबंध में उनकी मूल प्रकृति जिस तरह प्रकट हो रही है इसलिए इस महत्वपूर्ण कारक की तुलना में यह महत्वहीन होता है, जैसे चंद्रमा की शीतल रोशनी की बौछार के सामने उसपर काले धब्बे महत्वहीन हो जाते हैं।

एक दूसरा बहुत ही उपयोगी ध्यान देने वाली बात है जिसे आप अपने अंदर पैदा कर सकते हैं, शास्त्रों की आंखों से देखना और सीखना कि भक्त में प्रशंसनीय गुण क्या क्या हैं। आप भगवद गीता या श्रीमद् भागवताम से बार-बार प्रासंगिक विषय का अध्ययन कर सकते हैं जहांपर कृष्ण उनकी भक्ति में लगे लोगों का गुणगान करते हैं और वे उनको कितने प्रिय हैं। उदाहरण:- गीता के श्लोक 7.16-18, 9.14,15,22, 9.29-34 देखें। हम भक्तों की वास्तविक स्थिति के लिए बताए हुए इन मार्गों पर नियमित रूप से ध्यान करने से, बहुत गहरा सम्मान और प्रशंसा कर सकते हैं, जो कि बाह्य, परिस्थितियों और अस्थायी विशेषताओं से परे रहेंगे उनके ऊपर ध्यान देना है और उनके मूल गुण जो कृष्ण में आश्रय लेने पर है उस पर ध्यान केंद्रित करे और इसकी सराहना करे।

इस आध्यात्मिक दृष्टिकोण को विकसित करने से, जो भक्त नहीं हैं उनके लिए इसे बढ़ाया जा सकता है; उनकी गलतियों से परेशान होने के बजाय, हम उनकी कठिनाइयों के मूल कारण को देखना सीख सकते हैं जैसे कि भगवान से उनका विलगाव और इस प्रकार उनके लिए करुणा विकसित करे।

इसके अलावा, इस तथ्य को याद दिलाना है कि ईमानदारी से की गयी भक्ति इतनी प्रबल है कि यह हमारे और दूसरों में, सभी विसंगतियों को मिटा सकती है।

भक्ति की प्रक्रिया बहुत शक्तिशाली है और सही साधनों को अपनाने और उन्हें स्वयं के ऊपर लागू करने से, जीवनभर की आदतों और बद्धता को आसानी से दूर किया जा सकता है। इस तथ्य पर भरोसा रखें और उत्साह के साथ इन सकारात्मक कदमों को उठाएं। जब हम सक्रिय रूप से सकारात्मक भाव पैदा कर रहे हैं, तो नकारात्मक के लिए कोई जगह नहीं है; और बात भी सच है! आप यह स्वीकार कर रहे हैं कि क्या गलत है और यह गलत क्यों है और आपको भी वास्तविक अफसोस महसूस होता है, लेकिन अब इस पर ध्यान न दें और अपने आप को निराशा या क्रोध के नकारात्मक विचारों से गुमराह न करें या आप गुरु और कृष्ण को कैसे नाराज कर रहे हैं। इसके बजाय सकारात्मक और सुधार की मुक्त विधि को अपनाएं - यह उनको (गुरु और कृष्ण) सबसे अधिक प्रसन्नता देगा और उनकी अवरोही कृपा को आकर्षित करेगा जो आपके हृदय को वैष्णवों की महिमा की गहरी प्रशंसा से भर देगा।

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