श्रील गौर किशोर दास बाबा जी महाराज के तिरोभाव (अन्तर्धान) महा-महोत्सव ।

Gaura Kishora Dasa Babaji Maharaja
वेदास!
20 Oct 2019

श्रील गौर किशोर दास बाबा जी महाराज का आविर्भाव (जन्म) 1838 में हुआ। 30 वर्ष तक आप गृहस्थ में रहे। पत्नी की मृत्यु के पश्चात आपने वृन्दावन में प्रस्थान किया जहां उन्होंने अगले तीस वर्ष निरन्तर भजन में बिताए। इसके पश्चात बाबा जी महाराज नवद्वीप द्वीप गए और वे अपने अंतिम श्वास तक वहीं रहे। आप अपने अप्राकृत नेत्रों से नवद्वीप मंडल के वासियों को धामवासियों के रूप में देखते थे तथा मधुकरी में मिले भिक्षा के द्रव्यों को लोगों के द्वारा फेंके मिट्टी के बर्तनों में पका कर किसी प्रकार अपना जीवन चलाया करते थे। ऐसा सुना जाता है कि आप कभी गंगाजल पीकर, कभी गंगा की मिट्टी खाकर और कभी तो भूखे रहकर ही निरन्तर हरिनाम करते रहते थे।

“भगवान गौरांग महाप्रभु स्वयं नाम अक्षरों को निरन्तर दिन रात लिखकर अतिशय आह्लादित होते थे।” (चैतन्य भागवत १.६.६)

श्रील गौरकिशोर दास बाबा जी शौचालय के पास बैठकर ‘हरे कृष्ण‘ महामन्त्र का जप करते थे। चूँकि अनेक लोग आकर उनके भजन में बाधा डालते थे, इसलिए उनकी संगति से बचने के लिए वे शौचालय के पास बैठे रहते और अंदर से दरवाजा बंद कर लेते। कोई बाबा से मिलने आता तब भी वे दरवाजा न खोलते। वे ऐसा समझते थे कि शौचालय की दुर्गन्ध भौतिकवादी लोगों की संगति से अच्छी है।

श्री भक्ति सिद्धान्त सरस्वती ठाकुर बाबा जी महाराज के शिष्य थे जो अक्सर कहा करते थे कि मेरी नज़र में श्रीमद्भागवतम् का तात्पर्य अगर कोई ठीक ढंग से जानने वाला है तो वे हैं श्रील गौर किशोर दास बाबा जी महाराज। कभी-कभी आप यह भी कहा करते थे कि श्रीमद्भागवत के सर्वोत्तम विद्वान श्रील गौर किशोर दास बाबा जी महाराज हैं। हालांकि दुनियावी दृष्टि से श्रील गौर किशोर दास बाबाजी महाराज अपने हस्ताक्षर भी ठीक से नहीं कर सकते थे। नवम्बर 1915 में आपने यह देह त्यागकर नित्य लीला में प्रवेश किया।

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