हनुमान जी को भगवान रामचंद्र जी का निर्देश।

hanuman bhakt
पार्थ!
26 Apr 2019

यह शरीर अस्थायी है। भले ही शरीर को चंदन, कपूर, कस्तूरी, और अन्य ख़ुशबु से नहलाया जाता है, फिर भी, शरीर का ऐसा स्वभाव है कि बदबू आती है। यहां तक ​​कि मीठी वस्तुयें जैसे कि चीनी, शहद, और फल जो इस शरीर के अंदर जाके अप्रिय मल में बदल जाते हैं।
मीठा पानी, जैसे दूध और नारियल पानी, हमारे शरीर से जाने के बाद एक अप्रिय नमकीन मूत्र के रूप में बाहर निकलता है। शरीर द्वारा पहना जाने वाला शुद्ध सफेद कपड़ा गंदा हो जाता है। इसलिए जो लोग उच्च आत्मा वाले होते हैं, वे स्पष्ट रूप से शरीर से संबंधित दुख और सुख हैं उससे प्रभावित नहीं होते हैं। यह शरीर एक गहरे अंधेरे कुएं के अलावा कुछ भी नहीं है।

वह एक सुंदर चित्र नहीं बना रहे है। पकने वाला फल स्वतः जमीन पर गिर जाता है। यह शरीर भी उसी तरह से गिरता है। जैसे आज चला गया है, वैसे ही कल भी चला जाएगा। जैसे कि यह महीना खत्म हुआ है, आने वाला महीना भी खत्म हो जाएगा। यह निश्चित है। और शरीर से संबंधित क्रियाएँ और आनंद भी समय के कारण समाप्त हो जाएंगे। हनुमान, अस्थायी से आसक्त न हो, क्योंकि यह अस्थायी है। मैं और मेरे वाली विचारों में मत जाओ। कर्ता होने का भाव, झूठे अहंकार में मत जाओ। 

जनवरी २०१५ में परमपूज्य रोमपाद स्वामी द्वारा रामेश्वरम में दक्षिण भारत की यात्रा के दौरान ४थे दिन ‘राम और सीता के अतीत’ नामक शीर्षक पर दिए प्रवचन से अपनाया गया है।

 

हे हनुमान, आपके कारण ही मेरी सुग्रीव से मित्रता हुई। मेरे लिये आपने समुद्र पार किया। मेरे लिये आपने सीता का पता लगाया।आपने जम्बुमाली और रावण के पुत्रों का वध किया। इन्द्रजीत के ब्रह्मास्त्र से बंधकर आप रावण के सामने खड़े रहे। मेरे लिये आपने इतने कष्ट उठाये। मैं कैसे आपके द्वारा की गई सेवाओं को भूल सकता हूं? अभी आप अपनी पूंछ में चोंट खायी अवस्था में हैं। अगर मैं आपको खो दूं तो मैं उस अंधे व्यक्ति की तरह हो जाउंगा जिसके बाकी अंग तो हों लेकिन फिर भी उसे ऐसा लगे मानो उसका जीवन व्यर्थ है। अगर आप चले गए तो मेरा जीवन व्यर्थ है।हे हनुमान आप एक निर्जीव की तरह न ही फल खा रहे हैं और न ही कन्दमूल।पिछली बार आप संजीवनी लाकर लक्षमण के प्राण वापस लाये थे।अभी आप उसी तरह निष्प्राण पड़े हुये हैं। आपने मेरा सीता से मिलन कराया है और अगर आप चले गए तो मुझे भरत से कौन मिलाएगा?

हनुमान जी कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दे रहे थे, जैसे कि वह बेहोश हो। राम जी बहुत व्याकुल हो गए और उनकी आंखो से आंसू बहने लगे वे बोले, "हनुमान मुझे छोड़कर मत जाओ"। उनकी आंखों से बह रहे आंसुओं से हनुमान जी पूरी तरीके से भीग गए और उसके बाद वह बाहरी चेतना में आए, और उन्होंने रामजी के चरणों को पकड़ लिया और बोले "मैंने फिर से एक बहुत बड़ा अपराध किया है आपने यहां पर शिवलिंग की स्थापना करी और मैंने उसे यहां से हटाकर मेरे शिवलिंग रखने की कोशिश करी। मैं कितना बड़ा मूर्ख हूं, और मैं किस प्रकार का सेवक हूं? रामजी ने कहा "आपने कोई भी अपराध नहीं किया है आपसे तो वो सेवा कर रहे हैं जो मैंने आपसे मांगी थी।

(२०१५ में, दक्षिण भारत यात्रा के दौरान चौथे दिन रामेश्वरम में श्रील रोमपाद स्वामी द्वारा श्री राम व सीता जी की लीलाओं से यह भाग लिया गया है।)

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