जप के लिए रुचि कैसे प्राप्त करें?

mantra jaap ke niyam
Prince!
2 Apr 2019

प्रश्न: यह कहा जाता है कि यदि कोई अपराध पूर्ण जप करता है तो वह लाखों वर्षों तक जप ही करता रहेगा लेकिन उसे पवित्र नाम में कभी रुचि नहीं मिलेगी साथ ही यह भी कहा जाता है कि केवल जप से ही जप में रुचि मिलती है। ये दोनों बातें कैसे संभव हैं? कृपया इस विरोधाभास का समाधान करें?

रोमपाद स्वामी द्वारा उत्तर: अपराधपूर्ण जप व्यर्थ नहीं है। हालांकि, अपराधों के साथ अपूर्ण दोषपूर्ण जप के माध्यम से, हृदय को शुद्ध करने और जप के फल को दिखने के लिए एक लंबा समय लगता है, अर्थात जप के लिए एक रुचि विकसित करना, और भगवद-प्रेम की स्थिति तक पहुंचना। इसलिए, जप के अतिरिक्त, यह जानने का प्रयास करना चाहिए कि पवित्र नाम के जाप के प्रति क्या अपराध हैं और कठोरता के साथ उन अपराधों से बचें। यह केवल व्यक्ति के प्रयास के ऊपर है कि कितना वो जप के द्वारा जाप में रुचि की कमी को दूर कर सकता है और नामापराध को दूर करने की शक्ति भी प्राप्त कर सकता है।

दूसरे शब्दों में, यदि कोई पवित्र नाम के प्रति अपराध कर रहा है, तो उसका समाधान जप को छोड़ना नहीं है, बल्कि व्यक्ति को नामापराधों को दूर करने के लिए बहुत सावधानीपूर्वक प्रयास द्वारा मात्रात्मक और गुणात्मक रूप से जाप को बढ़ाना है।

अगर कोई सोचता है कि नामापराध जारी रखना ठीक है, क्योंकि जप के द्वारा उसके सभी अपराध अपने आप निष्प्रभावी कर दिये जाएँगे, इस तरह की मानसिकता को सबसे बड़ा अपराध माना जाता है, और पवित्र नाम कभी भी उस व्यक्ति पर कृपा नहीं करेंगे, जो ऐसा रवैया रखता है।

जो शुद्धि 'अनर्थ-निवृत्ति के अवस्था में' जप से होती है, वह उस बिंदु पर ले आती है, जहाँ व्यक्ति अपने अपराधों को दूर कर सकता है; लेकिन अगर कोई बेपरवाह और लापरवाही से नामापराधों को दूर करने के प्रति उदासीन रहता है, तो उस व्यक्ति को जप का पूरा लाभ नहीं मिलेगा। यह आपके द्वारा उद्धृत पहले कथन का निहितार्थ है। इसलिए, दो बयानों के बीच कोई वास्तविक विरोधाभास नहीं है।

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