जीवन के द्वंदो से कैसे निपटा जाये?

Jeevan Ke Dvando Se Kaise Nipata Jaye
वेदास!
1 Aug 2019

जीवन के द्वंदो से कैसे निपटा जाये? (पूर्ण में पूछताछ):

प्रश्न: मैं यह पूछना चाहूंगा कि मैं शिक्षा में पिछले दो वर्षों से असफलता के रूप में पतन का सामना कर रहा हूं जिसके कारण मैं हमेशा अपनी असफलताओं के बारे में सोचता रहता हूं और हमेशा तनाव में रहता हूँ कि मेरे जीवन में कुछ घट जाएगा। क्या यह मेरी ज़िंदगी का बुरा हिस्सा है या कुछ और?

रोमपाद स्वामी द्वारा जवाब: कृपया जवाब के लिए डायजेस्ट 259 बी देखें! 

प्रश्न: एक कनिष्ठ भक्त, उसके भौतिक क्रिया-कलापों में उतार-चढ़ाव का इलाज कैसे कर सकता है, यह विचार करके इस अवस्था में वे अहसास तो करते हैं लेकिन इस पर कोई अमल नहीं है?

कृष्ण इस प्रश्न को भगवद्गीता (2.14) की शुरुआत में हमारे लाभ के लिए उत्तर देते हैं। (2.14)

मात्रास्पश्तु कौन्तेय शीतोष्ण सुख दुःखदाः
अगामापयिनो अनित्यस ताम्स तितिक्ष्व भारत

"हे कुंती पुत्र! सुख तथा दुख का क्षणिक उदय तथा कालक्रम में उनका अंतर्धान होना सर्दी तथा गर्मी की ऋतुओं के आने जाने के समान है। हे भरतवंशी! वे इंद्रीयबोध से उत्पन्न होते है और मनुष्य को चाहिए कि अविचल भाव से उनको सहन करना सीखे।”

कृष्ण सलाह देते हैं कि हमे शुरूआत में द्वैत को सहन करना सीखना हैं। इस अवस्था में, जैसा कि आप ने बताया है, एक सैद्धांतिक समझ है, लेकिन उस समझ में जीने के लिए गहरी अनुभूति और दृढ़ विश्वास का अभाव है। लेकिन उत्तम बुद्धि के द्वारा इसको बर्दाश्त करना चाहिए। बेशक, इस दुनिया के सभी लोग विकल्प के बिना इन सारी चीजों को बर्दाश्त करने के लिए मजबूर है, लेकिन कृष्ण जिस सहिष्णुता की अनुशंसा कर रहे हैं वो 'दाँतों को टीसकर सहने' वाली सहिष्णुता नहीं है, बल्कि दिव्यता में आश्रय लेना है और दिव्य ज्ञान में मन को लगाना है, और उस क्षमता पर असुविधाएं, सफलताओं या विफलताओं के बावजूद किसी भी निर्धारित कर्तव्यों को करते रहना है। प्रगतिशील अमल और अनुभूति के साथ, जैसा कि मन को उच्च प्रकृति द्वारा नियंत्रण में लाया जाएगा, अगले चरण में ऐसे उतार-चढ़ाव की ओर समानता आएगी और फिर इस तरह के पतन से हम उदासीन होंगे। यह गीता के 6.7- 9 श्लोक में वर्णित है। उस चरण में, व्यक्ति खुशी या संकट, सम्मान या अपमान, सफलता या असफलता, पत्थर या सोना, मित्र या शत्रु - सभी को समान समझता है।

भगवान की सेवा द्वारा और उनके साथ सभी के संबंध जोड़कर सबकुछ देखने के अभ्यास करने से इस तरह की चेतना को प्राप्त करता है। इस प्रकार एक भक्त कुछ मूल्यवान, यहां तक ​​कि बीमारी, अपमान, असफलता या जीवन में उलझन - यदि यह कृष्ण की सेवा के अनुकूल है तो ठीक अन्यथा वह अपनी तथाकथित सफलता, प्रसिद्धि, धन आदि की परवाह नहीं करेगा।

इस तरह व्यक्ति अचल भक्ति के अभ्यास के प्रगतिशीलता के माध्यम से भगवान के साथ अपने संबंधों में असीम आंतरिक आध्यात्मिक सुख का अनुभव करना शुरू देता है, जब कोई पूरी तरह से दिव्यता में होता है तो भौतिक अस्तित्व के उतार चढ़ाव की तरंगों का कोई प्रभाव नहीं होता; गीता 6.20, 14.22-25. इस तरह से एक संक्षिप्त मानचित्र दिया है जिससे कि हम आगे बढ़ते हैं!

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