मैं रामभक्त क्यूँ हूँ

vedashindi
वासुदेव:!
5 Sep 2018

रामचरितमानस में एक कथा आती है कि जब महादेव ऋषिमुनियों से माता पार्वती माता की परीक्षा लेने को कहते हैं ताकि वो उन्हें उसके पथ से गिरा सके।ऋषिमुनि पार्वती माता के पास पहुंचते हैं और उनसे पूछते हैं की आप इस निर्जन स्थान पर किस कामना की पूर्ति के लिए तप कर रही हैं । पार्वती माता उन्हें प्रणाम करती है और बताती हैं कि वो भगवान शिव को पतिरूप में प्राप्त करने के लिए तप कर रही हैं । जब ऋषिमुनि ये सुनते हैं तो उनका उपहास उड़ाते हुए कहते हैं कि आजतक नारदजी का उपदेश सुनकर किसका भला हुआ है। नारदजी ने दक्ष के पुत्रों को उपदेश दिया था जिसके बाद उन्होंने कभी घर के मुंह भी नहीं देखा और ब्रह्मचारी हो गए। जो स्त्री पुरुष नारदजी की सीख सुनते हैं , वो घर छोड़कर अवश्य ही भिखारी हो जाते हैं। उनके वचनों का विश्वास मानकर तुम ऐसा पति चाहती हो जो स्वाभाव से ही गुणहीन, निर्लज, नर-कपालों की माला पहननेवाला , कुलहीन, बेघर, नंगा और शरीर पर सांप लपटे रखनेवाला हो। 

ऐसा वर मिलने से तुम्हे क्या सुख होगा। तुम उस नारद के द्वारा ठग ली गयी हो। सती के जाने के बाद शिव को कोई चिंता नहीं रही . अब तो वे भीख मांगकर खा लेते है और सुख से सोते हैं। ऐसे स्वाभाव से ही अकेला रहनेवाले के घर में भला कभी स्त्री टिक सकती है। अब भी हमारा कहा मानो, हमने तुम्हारे लिए एक वर चुना है जिसकी वंदना पूरा संसार और वेद करते हैं। वह दोषों से रहित, सारे सद्गुणों की राशि, लक्ष्मी का स्वामी और वैकुण्ठपुरी का रहनेवाला है। हम ऐसे वर को लाकर तुमसे मिला देंगे। ये सुनकर ही पार्वती हँसकर बोली जो एक समझने लायक बात है:


महादेव अवगुन भवन बिष्णु सकल गुन धाम ।
जेही कर मनु राम जाहि सन तेहि तेहि सन काम ।।


 "माना की महादेव अवगुणों के भवन हैं और विष्णु समस्त सद्गुणों के धाम हैं; पर जिसका मन जिसमे रम गया, उसको तो उसी से काम है।"

इसमें ध्यान देने की बात ये है कि पार्वती माता ने अपनी भक्ति का बचाव कितनी सुंदरता के साथ किया है। ऐसे ही सनातन धर्म में भक्ति का सिद्धांत है। जिसका मन जिसमें रम जाए वो उसका ही होना चाहता है चाहे फिर दुनिया कुछ भी कहे। सब कुछ आपकी भावना पर निर्भर करता है। मैंने अपने हृदय में भगवान राम को जगह दे दी है। जब तक मैं जीवित हूँ तब तक वो जगह किसी को नहीं मिल सकती। मैं आदर सबका करता हूँ पर हृदय में केवल राम का वास है। मुझे नहीं फ़र्क़ पड़ता की दुनिया क्या कहती है और अगर किसी को कोई फ़र्क़ पड़ता है तो उसकी भक्ति में कहीं ना कहीं खोट है। अटूट विश्वास ही भक्ति में विजय का कारण होती है और आपको आपके ईश्वर के धाम तक पहुँचाती है । 
 

अगर परमात्मा की भक्ति में विश्वास नहीं ,
तो इस जीवन में किसी से आस नहीं ,
हृदय से उसको भजो ,परमात्मा मित्र है तुम्हारा,
होने देगा तुम्हारा ह्रास नहीं

 

।। जय श्रीराम।।

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