मकर संक्रांति का महत्व

makar sankranti in hindi
राजेश पाण्डेय, पीएच॰डी॰ !
15 Jan 2019

श्रीमद्भागवतम् 7.14.20-23-23 के तात्पर्य में श्रील प्रभुपादजी ने मकर संक्रांति के बारे में बताया है। उन्होंने उल्लेख किया कि अयन शब्द का अर्थ है "पथ’' या “ गमन ''। वे छः मास जिनमें सूर्य उत्तर की ओर जाता है उत्तरायण अर्थात् उत्तरी पथ कहलाते हैं और वे छह मास जब सूर्य दक्षिण की ओर जाता है । दक्षिणायन या दक्षिणी पथ कहलाते हैं। इनका उल्लेख भगवद्गीता (८ .२४ - २५) में हुआ है। जिस दिन सूर्य उत्तर की ओर जाना प्रारम्भ करता है और मकर राशि में प्रवेश करता है, वह मकर संक्रान्ति कहलाता है । जिस दिन सूर्य दक्षिण की यात्रा प्रारम्भ करके कर्क राशि में प्रवेश करता है , वह कर्कट संक्रान्ति कहलाता है। वर्ष के इन दोनों दिनों में श्राद्ध पर्व मनाया जाना चाहिए।

विषुव या विषुव संक्रान्ति का अर्थ है मेष संक्रान्ति – वह दिन जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है। तुला संक्रान्ति के दिन सूर्य तुला राशि में प्रवेश करता है। ये दोनों दिन वर्ष में एक बार पड़ते हैं। योग शब्द सूर्य तथा चन्द्र के विशेष सम्बन्ध का सूचक है जब वे आकाश में घूमते हैं। योग की सत्ताइस विभिन्न कोटियाँ हैं जिनमें से सत्रहवीं व्यतीपात है। जिस दिन यह पड़े उस दिन श्राद्ध कर्म करना चाहिए। तिथि या चान्द्र दिवस सूर्य तथा चन्द्रमा के देशान्तरों की दूरी है। कभी - कभी तिथि चौबीस घण्टे से कम होती है। जब कोई तिथि सूर्योदय के बाद शुरू होती है और अगले दिन के सूर्योदय के पहले अन्त होती है , तो पिछली तिथि तथा अगली तिथि सूर्योदयों के मध्य चौबीस घण्टों के दिन का स्पर्श करती है। यह त्र्यहस्पर्श कहलाता है अर्थात् तीन तिथियों के थोड़े - थोड़े अंश द्वारा स्पर्श हुआ दिन।

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श्रील जीव गोस्वामी ने अनेक शास्त्रों से उद्धरण दिये हैं जिनमें कहा गया है कि पितरों को एकादशी तिथि को श्राद्ध की आहुतियाँ नहीं दी जानी चाहिए। जब मृत्यु तिथि एकादशी को पड़े तो श्राद्ध कर्म एकादशी के दिन नहीं, अपितु अगले दिन द्वादशी को करना चाहिए। ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है): 

ये कुर्वन्ति महीपाल श्राद्धं चैकादशीदिने ।

त्रयस्ते नरकं यान्ति दाता भोक्ता च प्रेरकः ॥

यदि कोई अपने पुरखों की श्राद्ध की आहुतियाँ एकादशी तिथि को देता है, तो श्राद्धकर्ता एवं वे पुरखे जिनके लिए श्राद्ध किया जाता है तथा पुरोहित तीनों नरकगामी होते हैं)।

सदा ही भगवान के नाम का जप करिए और ख़ुश रहिए। “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।। “परम विजयते श्रीकृष्ण संकीर्तनम” इस कलियुग में यह संकिर्तन आंदोलन (कृष्ण के पवित्र नाम का सामुहिक जाप) मानवता के लिए प्रमुख वरदान है।

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हरे कृष्ण!! 

 

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