पाप से घृणा करो पापियों से नहीं?

vedashindi
नेहा!
29 Aug 2018

पाप से घृणा करो पापियों से नहीं? रोमपाद स्वामी द्वारा लिखित: 

 प्रश्न: मैं सिर्फ यह पूछना चाहूंगा कि कोई बुरा व्यक्ति खुद से प्यार कर सकता है (क्या इसकी अनुमति है)? क्या इससे उसे बेहतर व्यक्ति बनने में मदद मिल सकती है?

रोमपाद स्वामी द्वारा उत्तर: हम सभी कृष्ण के अंश है। इस प्रकार मूल रूप से हम सभी शुद्ध हैं; आत्मा स्वयं न तो बुरा या अच्छा है। ईश्वर से दूर होकर और भौतिक शक्ति के संग में आने से बुरे गुणों से संक्रमित हो जाता है - इसका समाधान यह है कि हमे केवल प्रेम करने कि प्रवृत्ति को वापस कृष्ण या भगवान के पास लाना है और एक बार फिर से उस व्यक्ति में देवताओं के सभी अच्छे गुण प्रकट हो जाएंगे।

 एक 'बुरे' व्यक्ति को निश्चित रूप से खुद की निंदा करने की आवश्यकता नहीं है। वे "पाप से घृणा करो पापियों से नहीं" वाली शिक्षाओं को अपने ऊपर लागू कर सकते हैं - यानी यह मानते हैं कि उनका पिछला आचरण और मानसिकता सही नहीं था और उसके लिए उनको खेद है, लेकिन खुद को माफ करने के लिए भी तैयार रहें। अगला महत्वपूर्ण कदम यह होना चाहिए कि यह देखना है कि इस अस्थायी बाधाओं से परे उनके शुद्ध आत्मा का भगवान के संबंध के साथ का शाश्वत सम्बंध - जोकि भगवान के शाश्वत सेवक के रूप में है और इस प्रकार वो उनको बहुत प्रिय है। एक सुधरी हुयी आत्मा के लिए उसके पिछले बुराइयों के लिए कुछ पछतावा महसूस करना अप्राकृतिक नहीं है - इस तरह के ईमानदारी से किए हुए पछतावा उपयोगी हो सकते हैं जब वे सही तरीके से किये जायें क्योंकि यह उन अपराधों के परिणामों को ख़त्म करते हैं। लेकिन उसको शोक और आत्म-ग्लानि में रहने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि अपने आप को क्षमा करें और उत्सुकता से आगे बढ़ने के लिए क़दम बढ़ायें और भगवान के साथ अपने रिश्ते को बहाल करें, जो भविष्य में पतन को रोक देगा।

हालांकि स्वतंत्र रूप से अपने स्वयं के उपर बहुत ज्यादा ध्यान केंद्रित करना, स्वयं को बदलने के लिए सबसे अच्छा तरीका नहीं हो सकता है। यह शुरू में गहरी नकारात्मक सोच को ठीक करने में मदद कर सकता है। हालांकि, एक स्थायी और टिकाऊ प्रभाव क्या होगा, यद्यपि सकारात्मक भावना के साथ से भगवान के साथ हमारे प्रेम संबंध की पहचान को पैदा करना है। जब हम ऐसा करते हैं, तो भगवान - एक व्यक्ति होने के नाते - प्रतिफल में पिछली गलतियों के सभी फलो को पूरी तरह से मुक्त कर देते हैं। परम भगवान की दया असीमित है - वह हमेशा हममें से प्रत्येक को एक नया मौका देने के लिए तैयार रहते हैं, और इस तरह कोई भी  खुशी से उनकी सेवा करके उनके साथ खुद के सम्बंध को पुनःस्थापित कर सकता है। ऐसा करके, सभी अवांछित आदतों को जल्दी से खत्म कर दिया जाता है और वह पूरी तरह से धार्मिक और शांतिपूर्ण हो जाता है। और जब हम उनको प्यार करते हैं, तो हम स्वत:रूप से हर किसी को प्यार करते हैं संतुष्ट करते हैं और उसमें खुद को शामिल करते हैं - जैसे कि जब उंगलियां पेट में भोजन लाने के लिए काम करती हैं, तो उंगलियों को स्वतःरूप से पोषित और उत्साहित होती हैं और अलग से प्रयास किए बिना खुद को संतुष्ट रहती हैं।

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