रामचरितमानस में सत्संग की महिमा।

Ramcharitmanas
वासुदेव:!
9 Aug 2018

                                               बिनु सत्संग बीबेक ना होयी । राम कृपा बिनु सुलभ ना सोयी ।।

                                               सत्संगत मुद मंगल मूला । सोयी फल सिधी सब साधन फूला ।।

अर्थ: सत्संग के बिना विवेक नहीं होता और श्रीरामजी की कृपा के बिना वह सत्संग सहज में मिलता नहीं | सत्संगती आनंद और कल्याण की जड़ है | सत्संग की सिद्धि ही फल है और सब साधन तो फूल हैं ।

 

अभिप्राय: मनुष्यों में एक आदत है की वो हर वस्तु को अपने तरीक़े से देखते हैं । यह चौपाई भी कुछ ऐसी है, क्यूँकि जैसे कहते हैं की जितनी मान्यताएँ उतने रास्ते वैसे ही जितनी व्यक्ति उतनी ही तरह की सोच । अगर स्पष्ट शब्दों में कहूँ तो 'सत्संग' का अर्थ है अच्छे लोगों का संग किंतु सनातन धर्म में सत्नसंग के मायने इससे कहीं और अधिक हैं चूँकि अच्छे के मतलब इस संसार में अलग अलग हैं ।

उदाहरण के लिए कुछ लोग सोचते हैं की जो मेरा हित करे वो अच्छा है और जो अहित करे वो बुरा है । ज़रा सोचिए की अगर कोई मदिरापान करने को ही अपना हित समझे तो जो व्यक्ति उसे मदिरापान करने के लिए कहे और उसकी सहायता करे वो अच्छा है और जो उसे मदिरापान से दूर रखे वो बुरा है । अगर हम इसे ऊपर दे गयी चौपाई के तौर पर देखे तो इसके मायने ही बदल जाते हैं ।

इसलिए सनातन धर्म में जो 'सत्संग' का अर्थ देखने को मिलता है वो है 'संतों का संग' । ऐसा इसलिए क्यूँकि संत अथाह ज्ञान का भंडार होते हैं और हमेशा मनुष्य को परमात्मा के रास्ते पर ले जाने का प्रयास करते हैं । वो अपने ज्ञान का उपभोग हमेशा मनुष्य की भलाई के लिए करते हैं और उनका संग अगर मिल जाए तो ही हमें ऐसा विवेक मिल सकता है की हम सत्य और मिथ्या में अंतर कर सके ।

ज्ञान और अज्ञान को उनकी तार्किक दृष्टि से देख सकें । पर संतों का संग भी आसानी से नहीं मिलता । जैसे कहा जाता है की भगवान की मर्ज़ी के बिना एक पत्ता भी नहि हिल सकता वैसे ही परमात्मा की मर्ज़ी के बिना सत्संग नहीं मिलता । आनंद और कल्याण का एकमात्र रास्ता केवल सत्संग है जिसकी सिद्धि केवल भगवान की कृपा से ही ही सकती है इसलिए हमें चाहिए की हम संतों का सम्मान करे ताकि उनकी कृपा हमें मिल सके ।

 

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