श्रवण की विधि को सुधारना

shravan
आदित्य!
29 Jun 2019

प्रश्न: मुझे आध्यात्मिक विचारधाराओं पर कुछ स्पष्टीकरण चाहिए। यदि मेरे पढ़ने व सुनने में कुछ छनाव है, तो मै कैसे समझ सकता हूं कि मैंने सही संदेश प्राप्त किया है या नहीं?

रोमपाद स्वामी द्वारा उत्तर: आप समझ सकते है आपका श्रवण ठीक है या नही। जब आप श्रवण के लिए एक स्वाभाविक आकर्षण और लगातार होने वाले उत्साह को महसूस करे तब आप समझ जाएंगे। जब ऐसा ना हो तब तक आपके श्रवण में कुछ बाधा है।

सत्य निष्ठता के साथ प्रयास करते रहिए, इस चीज को समझकर की, "मैंने जो मेरी स्वतंत्र इच्छा का दुरुपयोग पहले किया है उसका फल मुझे भुगतना होगा। ये फल लंबे समय के लिए है। मेरी कारागार की सजा लंबे समय के लिए है और मुझे उसे स्वीकार करना होगा। मेरे द्वारा पहले स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने के कारण अब मेरी स्वतंत्रता सीमित हो चुकी है।यद्यपि कृष्ण भगवान मुझे बुला रहे हैं पर में फंसा हुआ हूं।"

इसके लिए लगातार प्रयास करने की आश्यकता हैं। प्रभुपाद से पूछा गया था, "में फंसा हुआ हूं मुझे क्या करना चाहिए?" प्रभुपाद का उत्तर था कि आप इस परिस्थिति से मुक्त होने के लिए शास्त्र और गुरु को अपने जीवन में लाइए। आप इन साधनों को अपने जीवन में लाए और अपना जीवन श्रद्धा पूर्वक जिए। अपनी श्रद्धा को प्रबल बनाए जिससे कि वह भगवत प्रेम के स्तर तक पहुंच सके। कृष्ण यह जानते हैं कि उस स्तर तक पहुंचने में हमारे लिए बाधाएं है वो यह नहीं कह रहे हैं कि "आपके ऊपर शर्म है।” वो आपके ऊपर कोई आरोप नहीं लगा रहे हैं, आपकी निंदा नहीं कर रहे हैं या आपका बहिष्कार नहीं कर रहे हैं। जब किसी चिकित्सक के पास कोई मरीज आता है तो चिकित्सक यह नहीं कहता, "आप बाहर निकाल जाओ क्योंकि आप बीमार हो।" जब वो यह देखते हैं कि मरीज दवाइयों को अच्छे से ले रहा है और सही तरीके से सब कुछ पालन कर रहा है, तब उन्हें विश्वास होता है कि बीमारी ठीक हो जाएगी। क्योंकि उन्हें यह विज्ञान पता है, इसलिए वो उत्साह और सहारा देते हैं।

"अभ्यास योग युक्तेन" - इस विश्वास के साथ प्रयास करते रहिए कि भगवान श्री कृष्ण अवश्य कृपा करेंगे। "मुक्ति पदे स दाय भाक" उसे भगवद्धाम उत्तराधिकार में मिलेगा। मात्र इस विधि का पालन करने से भगवद्धाम में प्रवेश मिल जाता है। किसी दिव्य वस्तु में श्रद्धा एवं विश्वास से हम मार्ग में आगे बढ़ते रहते हैं। इस मार्ग में लगातार आगे बढ़ते रहिए और आप जैसे जैसे आगे बढ़ेंगे आपके छन्ने कम होते जाएंगे और आपका अमल और प्रभावी होता जाएगा। यह विश्वास हमें होता है।

मान लीजिए कि कोई बहुत बड़ी दुर्घटना का शिकार हो जाता है और उसके अंग काम नहीं करते हैं। वह एक भौतिक चिकित्सक के पास जाता है जो उसे कहता है "आपके हाथ को २० बार ऊपर उठाइए।" कुछ समय के बाद हमारे अंग फिर से काम करने लगते हैं। हमारी एक आध्यात्मिक स्थिति है जिसे चिकित्सा एवं औषधि के द्वारा प्राप्त करना है। हमारी मुख्य औषधि है श्रवण करना और फिर उसे अमल में लाना। यह औषधि कान से हृदय तक ले जाई जाती है।

(४ सितम्बर को २००८ बास्टन में श्रील रोमपाद स्वामी महाराज के द्वारा श्रीमद्भागवत १.८.१४-१६ , पर दिए गये प्रवचन से लिया गया है)।

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