शुद्ध प्रेम को कैसे अनुभव करें?

vedashindi
Ajit!
4 Jan 2019

रोमपाद स्वामी महाराज द्वारा उत्तर: प्रेम आत्मा की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है। हालाँकि, शुद्ध प्रेम को केवल कृष्ण के साथ संबंध बना कर ही अनुभव किया जा सकता है; और वो अकेले ही पूरी तरह से हमारे प्रेम का आदान प्रदान कर सकते है। आत्मा के लिये कुछ गैर-आध्यात्मिक तरीक़े से जैसे कि शारीरिक संबंधों के आधार पर प्यार को पाना काफी असंगत है, और इसलिए काफी अधूरी है, जो अक्सर निराशा में समाप्त होती है। वास्तव में, कृष्ण सभी के मूल सिद्धांत हैं; इस प्रकार, जो कुछ भी हमारे लिए प्यारा या आकर्षक है, वह केवल कृष्ण के साथ संबंध के कारण है। अगर हम किसी से प्रेम करते हैं तो इसलिए क्योंकि वे कृष्ण के अंश है। उदाहरण के लिए, जब आत्मा, जो कृष्ण की अंश है, शरीर छोड़ती है, कोई भी मृत शरीर से प्रेम नहीं करता है।

 जैसे ही हम अपना ध्यान और स्नेह कृष्ण की ओर लगते हैं, आत्मा का स्वाभाविक प्रेम बिना किसी व्यवधान के - हमारे परिवार के सदस्यों के साथ-साथ तथा अन्य दूसरों के साथ भी बहाना या उमड़ना शुरू हो सकता है। श्रीमद भागवतम में शुद्ध प्रेम अकारण और अखण्ड के रूप में वर्णित है; कोई कारण या व्यक्तिगत प्रेरणा नहीं है कि हम कृष्ण से प्यार क्यों करते हैं, सिवाय इसके कि वह इतने प्यारे हैं, और इस तरह के प्रेम का कोई रोक नहीं है (श्रीमद भगवताम १.२.६)।

यहाँ कुछ व्यावहारिक कदमों पर विचार किया गया है

 रिश्ते प्यार और विश्वास पर आधारित होते हैं। कृष्ण को प्रेम के सभी आदान-प्रदान का केंद्र मानते हुए, अपने परिवार के सदस्यों के साथ, अपने संबंधों में समय और प्यार भरे प्रयासों को लगाने की कोशिश करें। 

प्यार अलग-अलग लोगों द्वारा अलग-अलग तरीकों से व्यक्त किया गया है।कृष्ण से प्रेम करते समय, कोई भी स्वार्थ की भावनाएं नहीं होती हैं, इसके कारण प्रेम पवित्र होता है, भौतिक लाभ के लिए सभी इच्छाओं से मुक्त है। वह बदले में कुछ भी उम्मीद नहीं रखता है।

बिना किसी अपेक्षा के प्यारे की सेवा करना-यही प्रेम को व्यक्त करने का सर्वोत्तम तरीका है। जब किसी ने भक्ति मंच से भक्ति योग के अभ्यास द्वारा कृष्ण के लिए उस तरह का प्रेम विकसित किया है, तो वह वास्तव में कृष्ण से सभी को जोड़कर और उनके अंश के रूप में सभी से भी प्रेम करेगा। यह अकेला ही आत्मा को पूर्णरूप से तुष्टिदायक है।

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