वास्तविक स्वतंत्रता क्या है?

swatantrata ka mahatva
राजेश पाण्डेय, पीएच॰डी॰ !
15 Aug 2018

स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनायें !! वास्तविक स्वतंत्रता क्या है? बार-बार जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और बीमारियों के चक्र से बाहर निकलना ही वास्तविक स्वतंत्रता कहलाता है।

श्रील प्रभुपाद बतायें हैं कि, वे किस प्रकार गांधीजी के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े थे और उनके गुरू, श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर जी ने उनसे कहा कि यह स्वतंत्रता नश्वर है और मनुष्य को यह जीवन शास्वत स्वतंत्रता के लिए उपयोग करना चाहिए। यानिकि इस मनुष्य जीवन को जन्म-मृत्यु के चक्कर से छूटकारा प्राप्त करने  में लगाना चाहिए।

कृष्ण के साथ हम अपने भूले हुए संबंध को कैसे स्थापित करें?

यह कैसे संभव है?

जब हमें यह समझ आ जायेगा कि हम शरीर नहीं आत्मा है और यह शरीर भौतिक तथा नश्वर है जबकि आत्मा शाश्वत है। हम भगवान के अंश हैं। भगवान सच्चिदानन्द हैं और उनके अंश होने के कारण हम भी सच्चिदानन्द है। लेकिन इस भौतिक जगत में त्रिगुणों के प्रभाव से कारण हम अपने अस्तित्व को भूल गये हैं।

 श्री चैतन्य महाप्रभु जीव की वास्तविक स्थिति के विषय में सनातन गोस्वामी को बताते हैं : “जीवेर स्वरुप हय, कृष्णेर नित्य दास ।(चै च अादि २०.१०८-१०९)” इसका मतलब ये है कि शाश्वत रूप से हम भगवान के दास है और हमें उनकी सेवा करनी है। और प्रीतिपूर्वक की गयी यही सेवा सनातन धर्म कहलाता है।

भगवान परम नियंता और पूर्णरूप से स्वतंत्र है। उनका अंश होने के कारण जीव में भी सूक्ष्म रूप से नियंत्रण तथा स्वतंत्र होने की प्रवृत्ति है। भगवान ने जोवों को इच्छा शक्ति दे रखी है। वे अपनी इच्छाशक्ति का सदुपयोग या दुरुपयोग कर सकतें है। जब वह अपनी इच्छा से ईश्वर कि अधीन रह कर उनकी प्रीतिपूर्वक सेवा करता तो वह अपने वास्तविक स्वरूप में व्यवस्थित होता है और यह उसके इच्छाशक्ति का सदुपयोग कहलाता है। लेकिन जब वह स्वयं भगवान बनना चाहता है तो वह अपनी इच्छाशक्ति का दुरुपयोग करता है। फिर वह इस भौतिक जगत में गिर कर जन्म मृत्यु के चक्कर में फँस जाता है और हमें इसी जन्म मृत्यु के चक्कर से सम्पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करनी है जो हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है। यह तभी संभव है जब हम (जीवात्मा), भगवान के सान्निध्य को स्वीकारें। उनकी सेवा द्वारा कृपा प्राप्त करने के उपरांत ही जीव को उन्ही के जैसी स्वच्छंदता की अनुभूति होगी)। 

हरी ॐ तत् सत्!! 

हरे कृष्ण 

डा. रामानन्द दास 

हमें हमेशा ही भगवान विष्णु का श्रवण, कीर्तन और स्मरण करना चाहिये।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। 

               हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।

 

 

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