अध्याय एक
श्लोक

अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते | 
निहत्य धार्तराष्ट्रान्न : का प्रीति स्याज्जनार्दन | | ३५ | |

शब्दार्थ :

अपि - तो भी ; त्रै-लोकस्य - तीनों लोकों के ; राज्यस्य - राज्य के ; हेतोः - विनिमय में ; किम्नु - क्या कहा जाय ; मही-कृते - पृथ्वी के लिए ; निहत्य - मारकर ; धार्तराष्ट्रान् - धृतराष्ट्र के पुत्रों को ; नः - हमारी ; का - क्या ; प्रीतिः - प्रसन्नता ; स्यात् - होगी ; जनार्दन - हे जीवों के पालक |

भावार्थ :

हे गोविन्द ! हमें राज्य , सुख अथवा इस जीवन से क्या लाभ ! क्योंकि जिन सारे लोगों के लिए हम उन्हें चाहते हैं वे ही इस युद्धभूमि में खड़े हैं | हे मधुसूदन ! जब गुरुजन , पितृगण , पुत्रगण , पितामह , मामा , ससुर , पौत्रगण , साले तथा अन्य सारे सम्बन्धी अपना धन एवं प्राण देने के लिए तत्पर हैं और मेरे समक्ष खड़े हैं तो फिर मैं इन सबको क्यों मारना चाहूँगा , भले ही वे मुझे क्यों न मार डालें ? हे जीवों के पालक ! मैं इन सबों से लड़ने को तैयार नहीं , भले ही बदले में मुझे तीनों लोक क्यों न मिलते हों , इस पृथ्वी की तो बात ही छोड़ दें | भला धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें कौन सी प्रसन्नता मिलेगी ?