अध्याय एक
श्लोक

पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः । 
तस्मान्नाह वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्सबान्धवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव | | ३६ | |

शब्दार्थ :

पापम् - पाप ; एव - निश्चय ही ; आयेत् - लगेगा ; अस्मान् – हमको ; हत्वा - मारकर ; एतान् - इन सब ; आततायिनः- आततायियों को ; तस्मात् - अतः ; न - कभी नहीं ; अहः - योग्य ; वयम् - हम ; हन्तुम् - मारने के लिए ; धार्तराष्ट्रान् - धृतराष्ट्र के पुत्रों को ; स-बान्धवान् - उनके मित्रों सहित ; स्व-जनम् - कुटुम्बियों को ; हि - निश्चय ही ; कथम् - कैसे ; हत्वा - मारकर ; सुखिनः - सुखी ; स्याम - हम होंगे ; माधव - हे लक्ष्मीपति कृष्ण ।
 

भावार्थ :

यदि हम ऐसे आततायियों का वध करते हैं तो हम पर पाप चढ़ेगा , अत : यह उचित नहीं होगा कि हम धृतराष्ट्र के पुत्रों तथा उनके मित्रों का वध करें | हे लक्ष्मीपति कृष्ण ! इससे हमें क्या लाभ होगा ? और अपने ही कुटुम्बियों को मार कर हम किस प्रकार सुखी हो सकते हैं ?