अध्याय एक
श्लोक

सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च |
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः | | ४१ | |

शब्दार्थ :

सङ्करः - ऐसे अवांछित बच्चे ; नरकाय - नारकीय जीवन के लिए ; एव - निश्चय ही ; कुल-घ्नानाम् - कुल का वध करने वालों के ; कुलस्य - कुल के ; च - भी ; पतन्ति - गिर जाते हैं ; पितर : - पितृगण ; हि - निश्चय ही ; एषाम् - इनके ; लुप्त - समाप्त ; पिण्ड - पिण्ड अर्पण की ; उदक - तथा जल की ; क्रियाः - क्रिया , कृत्य |

भावार्थ :

अवांछित सन्तानों की वृद्धि से निश्चय ही परिवार के लिए तथा पारिवारिक परम्परा को विनष्ट करने वालों के लिए नारकीय जीवन उत्पन्न होता है । ऐसे पतित कुलों के पुरखे ( पितर लोग ) गिर जाते हैं । क्योंकि उन्हें जल तथा पिण्ड दान देने की क्रियाएँ समाप्त हो जाती हैं ।