अध्याय दो
श्लोक

देहिनोऽस्मिन्यथा देह कोमार यौवने जरा । 
तथा देहान्तरप्राप्तिधीरस्तत्र न मुह्यति ॥१३॥

शब्दार्थ :

देहिनः - शरीरधारी की; अस्मिन् - इसमें; यथा - जिस प्रकार; देहे - शरीर में; कौमराम् - बाल्यावस्था; यौवनम् - यौवन, तारुण्य; जरा - वृद्धावस्था; तथा - उसी प्रकार; देह-अन्तर - शरीर के स्थानान्तरण की; प्राप्ति - उपलब्धि; धीरः - धीर व्यक्ति; तत्र - उस विषय में; - कभी नहीं; मुह्यति - मोह को प्राप्त होता है ।

भावार्थ :

जिस प्रकार शरीरधारी आत्मा इस ( वर्तमान ) शरीर में बाल्यावस्था से तरुणावस्था में और फिर वृद्धावस्था में निरन्तर अग्रसर होता रहता है , उसी प्रकार मृत्यु होने पर आत्मा दूसरे शरीर में चला जाता है । धीर व्यक्ति ऐसे परिवर्तन से मोह को प्राप्त नहीं होता ।