अध्याय दो
श्लोक

एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु ।
बुद्धया युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥३९॥

शब्दार्थ :

एषा - यह सब; ते - तेरे लिए; अभिहिता - वर्णन किया गया; सांख्ये - वैश्र्लेषिक अध्ययन द्वारा; बुद्धिः - बुद्धि; योगे - निष्काम कर्म में; तु - लेकिन; इमाम् - इसे; शृणु - सुनो; बुद्धया - बुद्धि से; युक्त: - साथ-साथ, सहित; यया - जिससे; पार्थ - हे पृथापुत्र; कर्म-बन्धम् - कर्म के बन्धन से; प्रहास्यसि - मुक्त हो जाओगे।

भावार्थ :

यहाँ मैंने वैश्र्लेषिक अध्ययन (सांख्य) द्वारा इस ज्ञान का वर्णन किया है। अब निष्काम भाव से कर्म करना बता रहा हूँ , उसे सुनो। हे पृथापुत्र ! तुम यदि ऐसे ज्ञान से कर्म करोगे तो तुम कर्मों के बन्धन से अपने को मुक्त कर सकते हो।