अध्याय दो
श्लोक

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥४५॥

शब्दार्थ :

त्रै-गुण्य - प्राकृतिक तीनों गुणों से सम्बन्धित; विषयाः - विषयों में; वेदा: - वैदिक साहित्य; निस्त्रै-गुण्य: - प्रकृति के तीनों गुणों से परे; भव - होओ; अर्जुन - हे अर्जुन; निर्द्वन्द्वः - द्वैतभाव से मुक्त; नित्य-सत्त्व-स्थ: - नित्य शुद्धसत्त्व में स्थित; निर्योग-क्षेम: - लाभ तथा रक्षा के भावों से मुक्त; आत्म-वान् - आत्मा में स्थित।

भावार्थ :

वेदों में मुख्यतया प्रकृति के तीनों गुणों का वर्णन हुआ है। हे अर्जुन! इन तीनों गुणों से ऊपर उठो। समस्त द्वैतों और लाभ तथा सुरक्षा की सारी चिन्ताओं से मुक्त होकर आत्म-परायण बनो।