अध्याय दो
श्लोक

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥५१॥

शब्दार्थ :

कर्म-जम् - सकाम कर्मों के कारण; बुद्धि-युक्ता: - भक्ति में लगे; हि - निश्र्चय ही; फलम् - फल; त्यक्त्वा - त्याग कर; मनीषिण: - बड़े-बड़े ऋषि मुनि या भक्तगण; जन्म-बन्ध - जन्म तथा मृत्यु के बन्धन से; विनिर्मुक्ताः - मुक्त; पदम् - पद पर; गच्छन्ति - पहुंचते हैं; अनामयम् - बिना कष्ट के ।

भावार्थ :

इस तरह भगवद्भक्ति में लगे रहकर बड़े-बड़े ऋषि, मुनि अथवा भक्तगण अपने आपको इस भौतिक संसार में कर्म के फलों से मुक्त कर लेते हैं। इस प्रकार वे जन्म-मृत्यु के चक्र से छूट जाते हैं और भगवान् के पास जाकर उस अवस्था को प्राप्त करते हैं, जो समस्त दुखों से परे है।