अध्याय दो
श्लोक

श्रीभगवानुवाच 
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥५५॥

शब्दार्थ :

श्रीभगवान् उवाच - श्रीभगवान् ने कहा; प्रजहाति - त्यागता है; यदा - जब; कामान् - इन्द्रियतृप्ति की इच्छाएँ; सर्वान - सभी प्रकार की; पार्थ - हे पथापुत्र; मनः-गतान् - मनोरथ का; आत्मनि - आत्मा की शद्ध अवस्था में; एव - निश्र्चय ही; आत्मना - विशुद्ध मन से; तुष्टः - सन्तुष्ट, प्रसन्न; स्थित-प्रज्ञः - अध्यात्म में स्थित; तदा - उस समय, तब; उच्यते - कहा जाता है ।

भावार्थ :

श्रीभगवान् ने कहा - हे पार्थः जब मनुष्य मनोधर्म से उत्पन्न होने वाली इन्द्रियतृप्ति की समस्त कामनाओं का परित्याग कर देता है और जब इस तरह से विशुद्ध हुआ उसका मन आत्मा में सन्तोष प्राप्त करता है तो वह विशुद्ध दिव्य चेतना को प्राप्त (स्थितप्रज्ञ) कहा जाता है ।