अध्याय दो
श्लोक

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति । 
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥७२॥

शब्दार्थ :

एषा - यह; ब्राह्मी - आध्यात्मिक; स्थिति: - स्थिति; पार्थ - हे पृथापुत्र; - कभी नहीं; एनाम् - इसको; प्राप्य - प्राप्त करके; विमुह्यति - मोहित होता है; स्थित्वा - स्थित होकर; अस्याम् - इसमें; अन्त - काले जीवन के अन्तिम समय में; अपि - भी; ब्रह्म-निर्वाणम् - भगवद्धाम को; ऋच्छति - प्राप्त होता है।

भावार्थ :

यह आध्यात्मिक तथा ईश्वरीय जीवन का पथ है, जिसे प्राप्त करके मनुष्य मोहित नहीं होता। यदि कोई जीवन के अन्तिम समय में भी इस तरह स्थित हो, तो वह भगवद्धाम को प्राप्त होता है।