अध्याय तीन
श्लोक

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्तिवष्टकामधुक् ॥१०॥

शब्दार्थ :

सह - के साथ; यज्ञाः - यज्ञों; प्रजा: - सन्ततियों; सृष्ट्वा - रच कर; पुरा - प्राचीन काल में; उवाच - कहा; प्रजापति: - जीवों के स्वामी ने; अनेन - इससे; प्रसविष्यध्वम् - अधिकाधिक समृद्ध होओ; एष: - यह; व:- तुम्हारा; अस्तु - होए; इष्ट - समस्त वांछित वस्तुओं का; काम-धुक् - प्रदाता ।

भावार्थ :

सृष्टि के प्रारम्भ में समस्त प्राणियों के स्वामी (प्रजापति) ने विष्णु के लिए यज्ञ सहित मनुष्यों तथा देवताओं की सन्ततियों को रचा और उनसे कहा, “तुम इस यज्ञ से सुखी रहो क्योंकि इसके करने से तुम्हें सुखपूर्वक रहने तथा मुक्ति प्राप्त करने के लिए समस्त वांछित वस्तुएँ प्राप्त हो सकेंगी ।"