अध्याय तीन
श्लोक

एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
आघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥१६॥

शब्दार्थ :

एवम् - इस प्रकार; प्रवर्तितम् - वेदों द्वारा स्थापित; चक्रम् - चक्र; - नहीं; अनुवर्तयति - ग्रहण करता; इह - इस जीवन में; यः - जो; अघ-आयु: - पापपूर्ण जीवन है जिसका; इन्द्रिय-आरामः - इन्द्रियासक्त; मोघम् - वृथा; पार्थ - हे पृथापुत्र (अर्जुन); सः - वह; जीवति - जीवित रहता है ।

भावार्थ :

हे प्रिय अर्जुन ! जो मानव जीवन में इस प्रकार वेदों द्वारा स्थापित यज्ञ-चक्र का पालन नहीं करता वह निश्र्चय ही पापमय जीवन व्यतीत करता है । ऐसा व्यक्ति केवल इन्द्रियों की तुष्टि के लिए व्यर्थ ही जीवित रहता है ।