अध्याय तीन
श्लोक

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥३४॥

शब्दार्थ :

इन्द्रियस्य - इन्द्रिय का; इन्द्रियस्य-अर्थ - इन्द्रियविषयों में; राग - आसक्ति; द्वेषौ - तथा विरक्ति; व्यवस्थितौ - नियमों के अधीन स्थित; तयोः - उनके; - कभी नहीं; वशम् - नियन्त्रण में; आगच्छेत् - आना चाहिए; तौ - वे दोनों; हि - निश्र्चिय ही; अस्य - उसका; परिपन्थिनौ - अवरोधक ।

भावार्थ :

प्रत्येक इन्द्रिय तथा उसके विषय से सम्बन्धित राग-द्वेष को व्यवस्थित करने के नियम होते हैं । मनुष्य को ऐसे राग तथा द्वेष के वशीभूत नहीं होना चाहिए क्योंकि ये आत्म-साक्षात्कार के मार्ग में अवरोधक हैं ।