अध्याय तीन
श्लोक

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥३५॥

शब्दार्थ :

श्रेयान् - अधिक श्रेयस्कर; स्वधर्म: - अपने नियतकर्म; विगुण: - दोषयुक्त भी; पर-धर्मात् - अन्यों के लिए उल्लेखित कार्यों की अपेक्षा; सू-अनुष्ठितात् - भलीभाँति सम्पन्न; स्व-धर्मे - अपने नियत्कर्मों में; निधनम् - विनाश , मृत्यु; श्रेय: - श्रेष्ठतर; पर-धर्म: - अन्यों के लिए नियतकर्म; भय-आवहः - खतरनाक, डरावना ।

भावार्थ :

अपने नियतकर्मों को दोषपूर्ण ढंग से सम्पन्न करना भी अन्य के कर्मों को भलीभाँति करने से श्रेयस्कर है । स्वीय (निजी) कर्मों को करते हुए मरना पराये कर्मों में प्रवृत्त होने की अपेक्षा श्रेष्ठतर है, क्योंकि अन्य किसी के मार्ग का अनुसरण भयावह होता है ।