अध्याय तीन
श्लोक

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङगः समाचर ॥९॥

शब्दार्थ :

यज्ञ-अर्थात् - एकमात्र यज्ञ या विष्णु के लिए किया गया; कर्मणः - कर्म की अपेक्षा; अन्यत्र - अन्यथा; लोकः - संसार; अयम् - यह; कर्म-बन्धनः - कर्म के कारण बन्धन; तत् - उस; अर्थम् - के लिए; कर्म - कर्म; कौन्तेय - हे कुन्तीपुत्र; मुक्त-सङग: - सङ्गः (फलाकांक्षा) से मुक्त; समाचर - भलीभाँति आचरण करो।

भावार्थ :

श्रीविष्णु के लिए यज्ञ रूप में कर्म करना चाहिए , अन्यथा कर्म के द्वारा इस भौतिक जगत् में बन्धन उत्पन्न होता है। अतः हे कुन्तीपुत्र! उनकी प्रसन्नता के लिए अपने नियत कर्म करो। इस तरह तुम बन्धन से सदा मुक्त रहोगे।