अध्याय चार
श्लोक

श्री भगवानुवाच
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥१॥

शब्दार्थ :

श्री-भगवान् उवाच - श्रीभगवान् ने कहा; इमम् - इस; विवस्वते - सूर्यदेव को; योगम् - परमेश्र्वर केसाथ अपने सम्बन्ध की विद्या को; प्रोक्तवान् - उपदेश दिया; अहम् - मैंने; अव्ययम् - अमर; विवस्वान् - विवस्वान् (सूर्यदेव के नाम) ने; मनवे - मनुष्यों के पिता (वैवस्वत) से ; प्राह - कहा; मनुः - मनुष्यों के पिता ने; इक्ष्वाकवे - राजा इक्ष्वाकु से; अब्रवीत् - कहा ।

भावार्थ :

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा - मैंने इस अमर योगविद्या का उपदेश सूर्यदेव विवस्वान् को दिया और विवस्वान् ने मनुष्यों के पिता मनु को उपदेश दिया और मनु ने इसका उपदेश इक्ष्वाकु को दिया ।