अध्याय चार
श्लोक

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥२॥

शब्दार्थ :

एवम् - इस प्रकार; परम्परा - गुरु-परम्परा से; प्राप्तम् - प्राप्त; इमम् - इस विज्ञान को; राज-ऋषयः - साधु राजाओं ने; विदः - जाना; स: - वह ज्ञान; कालेन - कालक्रम में; इह - इस संसार में; महता - महान; योग: - परमेश्र्वर के साथ अपने सम्बन्ध का विज्ञान, योगविद्या; नष्टः - छिन्न-भिन्न हो गया; परन्तप - हे शत्रुओं को दमन करने वाले, अर्जुन ।

भावार्थ :

इस प्रकार यह परम विज्ञान गुरु-परम्परा द्वारा प्राप्त किया गया और राजर्षियों ने इसी विधि से इसे समझा । किन्तु कालक्रम में यह परम्परा छिन्न हो गई, अत: यह विज्ञान यथारूप में लुप्त हो गया लगता है ।