अध्याय चार
श्लोक

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्र्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥३४॥

शब्दार्थ :

तत् - विभिन्न यज्ञों के उस ज्ञान को; विद्धि - जानने का प्रयास करो; प्रणिपातेन - गुरु के पास जाकर के; परिप्रश्र्नेन - विनीत जिज्ञासा से; सेवया - सेवा के द्वारा; उपदेक्ष्यन्ति - दीक्षित करेंगे; ते - तुमको; ज्ञानम् - ज्ञान में; ज्ञानिन: - स्वरुपसिद्ध; तत्त्व - तत्त्व के; दर्शिनः - दर्शी ।

भावार्थ :

तुम गुरु के पास जाकर सत्य को जानने का प्रयास करो । उनसे विनीत होकर जिज्ञासा करो और उनकी सेवा करो । स्वरुपसिद्ध व्यक्ति तुम्हें ज्ञान प्रदान कर सकते हैं, क्योंकि उन्होंने सत्य का दर्शन किया है ।