अध्याय पाँच
श्लोक

यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ।

एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥५॥

शब्दार्थ :

यत् - जो; सांख्यैः - सांख्य दर्शन के द्वारा; प्राप्यते - प्राप्त किया जाता है; स्थानम् - स्थान; तत् - वही; योगैः - भक्ति द्वारा; अपि - भी; गम्यते - प्राप्त कर सकता है; एकम् - एक; सांख्यम् - विश्लेषात्मक अध्ययन को; - तथा; योगम् - भक्तिमय कर्म को; - तथा; य: - जो; पश्यति - देखता है; स: - वह; पश्यति - वास्तव में देखता है।

भावार्थ :

जो यह जानता है कि विश्लेषात्मक अध्ययन (सांख्य) द्वारा प्राप्य स्थान भक्ति द्वारा भी प्राप्त किया जा सकता है, और इस तरह जो सांख्ययोग तथा भक्तियोग को एकसमान देखता है, वही वस्तुओं को यथारूप में देखता है।